
Narasimha · रक्षा · निर्भीक सत्य
परिचय
हिरण्यकशिपु को वरदान था — न मनुष्य मारे न पशु, न दिन में न रात में, न घर में न बाहर, न अस्त्र से न शस्त्र से। इसलिए नरसिंह आए — आधे मनुष्य आधे सिंह, संध्या के समय, चौखट पर, नाखूनों से। शर्तों के भीतर रहकर अन्याय को समाप्त किया। और फिर वही भयंकर रूप प्रह्लाद की गोद में शांत हो गया — क्रोध सत्य के लिए था, सत्य के सामने वह प्रेम बन गया।
आज का मौलिक मनन
जब बच्चे-सी श्रद्धा पर आँच आए, तब चुप मत रहो। सत्य के लिए खड़ा होना भी भक्ति है।
प्रह्लाद पाँच साल का था और अपने पिता के सामने खड़ा था — "मेरे भगवान हर जगह हैं, इस खंभे में भी।" उस बच्चे की श्रद्धा पर जब आँच आई, तब नरसिंह खंभा फाड़कर निकले। तुम्हारे आसपास भी कोई है — कोई बच्चा, कोई कमज़ोर, कोई नया — जिसकी सच्चाई या भरोसे को कुचला जा रहा है, और तुम "मेरा मामला नहीं" कहकर चुप हो। चुप्पी भी एक पक्ष है। सत्य के लिए खड़ा होना भक्ति ही है — शायद सबसे कठिन भक्ति।
छोटा अभ्यास
आज किसी कमज़ोर के पक्ष में एक बात कहो।
आज किसी ऐसे व्यक्ति की ओर देखो जिसकी आवाज़ दब रही है — दफ़्तर में जूनियर, घर में बच्चा या बुज़ुर्ग, समूह में जिसकी बात काटी जा रही है। उसके पक्ष में एक वाक्य कहो — शांत, साफ़, बिना गुस्से के: "इसकी बात पूरी होने दो", "यह ठीक कह रहा है"। बस एक वाक्य — पर आज ज़रूर।
ये मौलिक devotional reflections हैं; भविष्यवाणी या किसी देवता का उद्धरण नहीं।