अध्याय 1
परिवार में मिले एक कटु व्यवहार से बालक ध्रुव का मन दुखता है। वह अपना स्थान खोजने निकलता है। नारद उसे मन सँभालने और विष्णु-स्मरण का मार्ग देते हैं। ध्रुव का संकल्प केवल प्रतिद्वंद्वी से आगे निकलने की इच्छा से शुरू होता है, पर साधना उसे भीतर से बदलती है।
अध्याय 2
दर्शन मिलने पर उसे पहले की छोटी मांग का सीमितपन समझ आता है। भागवत का यह आख्यान बाहरी अपमान से आगे आत्मबोध की यात्रा भी है। अपने मनन में लक्ष्य रखें, पर अपनी गरिमा का पूरा आधार किसी दूसरे की स्वीकृति को न बनाएँ। बच्चे की पीड़ा को सुनना भी परिवार की जिम्मेदारी है।