अध्याय 1
कामिका एकादशी के माहात्म्य में विष्णु-स्मरण, तुलसी और दीपदान का वर्णन आता है। परंपरागत संवाद पुण्य की तुलना बड़े दानों और तीर्थों से करता है, ताकि साधक अपने सीमित साधनों में भी भक्ति का महत्व समझे।
अध्याय 2
इस कथा-परंपरा का केंद्रीय भाव अर्पण है। घर में उपलब्ध छोटी वस्तु भी आदरपूर्वक अर्पित हो सकती है। तुलसी की सेवा और दीप की उपमा मन को संभालने के सहारे बनते हैं।
अध्याय 3
इस पुनर्कथन में धार्मिक फलश्रुतियों को आर्थिक या आध्यात्मिक सफलता की गारंटी नहीं बनाया गया है। आज एक छोटा काम मन लगाकर करें, किसी साधारण व्यक्ति के योगदान को पहचानें और साधना के आकार से अधिक उसके भाव पर ध्यान दें।