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प्रह्लाद की भक्ति

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प्रह्लाद की कथा भागवत पुराण के सातवें स्कन्ध में आती है। राजा हिरण्यकशिपु अपने अधिकार को सर्वोपरि मानता था, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु का भक्त था। पिता के दबाव के बीच भी प्रह्लाद अपनी भक्ति से नहीं हटे।

प्रसंग में हिरण्यकशिपु पूछता है कि यदि विष्णु सर्वत्र हैं तो क्या वे स्तम्भ में भी हैं। कथा के निर्णायक क्षण में नरसिंह प्रकट होते हैं। इस रूप में न मानव का रूप अकेला है, न सिंह का; कथा अपने ढंग से राजा के वरदान और उसके अभिमान की सीमा दिखाती है।

यह मौलिक पुनर्कथन प्रसंग का परिचय है, पूरे अध्याय का अनुवाद नहीं। प्रह्लाद के संवाद और नरसिंह-प्रसंग को उनके मूल संदर्भ में पढ़ें। मनन का प्रश्न है: दबाव के बीच भी दया और सही आचरण पर टिकने के लिए मैं किस भरोसेमंद व्यक्ति की मदद ले सकता हूँ?

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