अध्याय 1
नारद संसार के दुःख देखते हैं और विष्णु से मनुष्य के लिए सहारा पूछते हैं। कथा का उत्तर सत्यनारायण के स्मरण, अपनी क्षमता के अनुसार पूजा और प्रसाद साझा करने में मिलता है। साधना का केंद्र दिखावा नहीं, सत्य का आश्रय है।
अध्याय 2
काशी का निर्धन ब्राह्मण यह संकल्प अपनाता है। उसके यहाँ आया लकड़हारा भी पूजा के बारे में पूछकर अपनी मेहनत की कमाई से आयोजन करता है। राजा उल्कामुख को देखकर व्यापारी साधु व्रत का वचन देता है, पर घर लौटकर उसे बार-बार टालता है। लीलावती और कलावती की स्मृति उस भूले वचन को फिर सामने लाती है।
अध्याय 3
व्यापारी संकटों और अपनी असत्य बात के बाद भूल स्वीकारता है। कलावती के प्रसाद भूलने तथा राजा तुंगध्वज के अभिमान वाले प्रसंग भी इसी धागे से जुड़ते हैं। पात्र विनम्र होकर लौटते हैं और बाँटने की रीति अपनाते हैं। इस पुनर्कथन का मनन है—कठिन समय में ही नहीं, सुविधा मिलने पर भी अपना वचन याद रखें।