अध्याय 1
वैकुंठ चतुर्दशी की कथा में विष्णु काशी में शिव की आराधना करते हैं। कमलों के अर्पण की संख्या में कमी आने पर अपनी निष्ठा व्यक्त करने का असाधारण प्रसंग आता है। शिव उस भक्ति को पहचानते हैं।
अध्याय 2
सुदर्शन चक्र की प्राप्ति और हरि-हर के परस्पर सम्मान की स्मृति इस आख्यान का भाग है। अन्य रूपों में धनेश्वर तथा वैकुंठ-द्वार के प्रसंग भी मिलते हैं। सभी संस्करणों को एक ही शब्दशः ग्रंथ मानना ठीक नहीं।
अध्याय 3
इस उत्सव का उपयोगी भाव अपनी उपासना के साथ दूसरे मार्ग का सम्मान है। शिव और विष्णु की भक्ति को प्रतियोगिता बनाने के बजाय एक-दूसरे के प्रति आदर से पढ़ें। इस कथा के दृश्य प्रतीकात्मक धार्मिक आख्यान हैं, शारीरिक त्याग की व्यवहारिक विधि नहीं।