
Shiva · मौन · त्याग · ध्यान
परिचय
समुद्र-मंथन में जो विष निकला, उसे किसी ने नहीं लिया — शिव ने कंठ में रोक लिया और नीलकंठ कहलाए। न निगला, न उगला — बस थामे रखा, बिना विचलित हुए। यही ध्यान है: जो कड़वा है उसे न भागाना, न पालना; देखते रहना, जब तक वह अपने आप शांत न हो जाए।
आज का मौलिक मनन
जो छोड़ना है, वह पकड़े रहने से भारी हो रहा है। मौन में उतरो, उत्तर वहीं है।
जो चीज़ तुम कसकर पकड़े हो — कोई रिश्ता, कोई पद, कोई पुरानी छवि — वह तुम्हें नहीं थामे है, तुम उसे थामे हो, और इसी पकड़ में हाथ दुख रहा है। शिव सब कुछ छोड़कर कैलाश पर बैठे हैं, इसलिए उनसे कुछ छीना नहीं जा सकता। आज उत्तर खोजने के लिए मत बैठो; बस बैठो। मौन में पहले शोर आएगा, फिर थकान, फिर वह साफ़ जगह जहाँ उत्तर पहले से रखा हुआ है।
छोटा अभ्यास
आज 11 मिनट पूर्ण मौन — फ़ोन दूर।
आज 11 मिनट पूरा मौन — फ़ोन दूसरे कमरे में, कोई संगीत नहीं, कोई माला भी नहीं। बस बैठो, रीढ़ सीधी, आँखें बंद या आधी खुली। विचार आएँ तो उनसे मत लड़ो; "आया, गया" कहकर जाने दो। 11 मिनट बाद जो एक बात सबसे साफ़ लगे, उसे लिख लो।
ये मौलिक devotional reflections हैं; भविष्यवाणी या किसी देवता का उद्धरण नहीं।