अध्याय 1
तीन मित्रों की कथा में एक युवक अपनी पत्नी को घर लाने के लिए इतना उतावला होता है कि दोनों परिवारों की चिंता अनसुनी कर देता है। यात्रा की तैयारी और परिस्थितियों पर विचार किए बिना वह निकल पड़ता है।
अध्याय 2
लोककथा रास्ते की लगातार विपत्तियों को शुक्र के अस्त होने की मान्यता से जोड़ती है। मित्र के समझाने पर युवक अपना आग्रह छोड़ता है और परिवार की सहायता स्वीकारता है। संकट के बीच उसे दूसरों की बात का मूल्य समझ आता है।
अध्याय 3
इस परंपरा को पढ़ते समय ज्योतिषीय विश्वास और यात्रा की वास्तविक सुरक्षा अलग रखें। हमारा मनन उतावले निर्णय से लौट सकने की क्षमता है। सलाह मानना हार नहीं; कभी-कभी समय, तैयारी और अपने साथ चल रहे व्यक्ति की सुविधा को महत्व देना ही सही कदम होता है।