समुद्र मंथन की कथा में देव और असुर मिलकर मन्दर पर्वत और वासुकि की सहायता से क्षीरसागर का मंथन करते हैं। अमृत की कामना है, लेकिन आरम्भ में हलाहल विष प्रकट होता है। लाभ की आशा में शुरू हुए प्रयास के सामने पहले एक बड़ा संकट आ खड़ा होता है।
भागवत पुराण के आठवें स्कन्ध के इस प्रसंग में देवता शिव की शरण लेते हैं। शिव लोक-कल्याण के लिए विष को स्वीकार करते हैं। पार्वती के सामने उनका निर्णय दूसरों के हित की चिंता के रूप में आता है। इसी विष के कारण उनका कण्ठ नील वर्ण का कहा जाता है और नीलकण्ठ नाम प्रसिद्ध है।
यह पारंपरिक कथा का मौलिक संक्षिप्त पुनर्कथन है। इसे किसी हानिकारक पदार्थ को छूने या सेवन करने की प्रेरणा न मानें। इसके भाव पर मनन करें: किसी साझा प्रयास की कठिनाई सामने आए तो जिम्मेदारी कौन लेगा, और सुरक्षित समाधान कैसे ढूँढा जाएगा?