अध्याय 1
एक नवविवाहित युवक को परिवार ने यात्रा टालने की सलाह दी, पर वह आग्रह करके पत्नी के साथ निकल पड़ा। रास्ते में उसे अपने ही समान दिखने वाला दूसरा व्यक्ति मिला। दोनों के दावों से पत्नी और आसपास के लोग असमंजस में पड़ गए।
अध्याय 2
युवक के लिए अपनी पहचान सिद्ध करना कठिन हो गया। लोककथा में वह अभिमान छोड़कर शिव से सहायता माँगता है। उसका प्रतिरूप अंतर्धान हो जाता है और दंपती की यात्रा फिर संभव होती है।
अध्याय 3
कथा बुधवार से जुड़े प्रदोष की लोकपरंपरा में सुनाई जाती है। इससे हर बुधवार की यात्रा को निषिद्ध न मानें। उपयोगी भाव यह है कि परिवार की सलाह सुनना, स्थिति समझना और अपने आग्रह की समीक्षा करना भी परिपक्वता का हिस्सा है।