अध्याय 1
शिव-पार्वती से जुड़े एक लोकप्रसंग में मंदिर के पुजारी से हुई भूल और उसके कठिन समय का वर्णन आता है। वह सहायता और मार्गदर्शन खोजता है। उसे सोलह सोमवार की साधना का संकल्प बताया जाता है।
अध्याय 2
वह नियमित स्मरण, पूजन और अपनी क्षमता के अनुसार प्रसाद बाँटने की रीति अपनाता है। लोककथा आगे इस संकल्प को सुनकर अपनाने वाले अन्य पात्रों तक पहुँचती है। हर नए प्रसंग में परीक्षा केवल इच्छा पूरी होने की नहीं, संकल्प निभाने की भी रहती है।
अध्याय 3
अंत में विनम्रता और भूल सुधारने पर जोर आता है। अलग पुस्तिकाओं में पात्र और प्रसंग बदलते हैं। इस संस्करण का भाव है—लंबा संकल्प छोटे नियमित कदमों से निभता है। कथा में वर्णित रोग-मुक्ति के प्रसंग धार्मिक आख्यान हैं; वास्तविक उपचार की जगह नहीं लेते।