अध्याय 1
एक साहूकार शिव का भक्त था और संतान की कामना करता था। लोककथा में उसे पुत्र मिलता है, पर उसकी आयु कम होने का संकेत भी मिलता है। माता-पिता बच्चे को भय में बाँधने के बजाय शिक्षा के लिए काशी भेजते हैं।
अध्याय 2
रास्ते में एक राजपरिवार अपने विवाह की कठिनाई छिपाने के लिए उस युवक को अस्थायी वर बनाता है। युवक राजकुमारी को लिखकर अपना सच बता देता है। काशी में आयु पूरी होने पर उसके प्राण चले जाते हैं; पार्वती की करुणा और शिव की कृपा से कथा उसे फिर जीवन देती है।
अध्याय 3
वापसी में सच सामने आता है और परिवारों का मिलन होता है। यहाँ सत्य बताने का छोटा निर्णय कथा को दिशा देता है। इसे जीवन की निश्चित आयु बताने की पद्धति न समझें; लोकआख्यान के रूप में पढ़ें और किसी संबंध की शुरुआत ईमानदारी से करने का भाव लें।