एकादशी व्रत
प्रत्येक मास की शुक्ल एवं कृष्ण एकादशी
विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी प्रत्येक पक्ष में आती है। अलग एकादशियों के नाम और कथाएँ भिन्न हैं।
BABA KA SANDESH · READ & REMEMBER
वार्षिक पर्व और तिथि-पक्ष के परिचय। वर्तमान वर्ष की दिनांक और पूजा-समय स्थानीय पंचांग से देखें।
प्रत्येक मास की शुक्ल एवं कृष्ण एकादशी
विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी प्रत्येक पक्ष में आती है। अलग एकादशियों के नाम और कथाएँ भिन्न हैं।
पौष कृष्ण एकादशी
इस एकादशी की परंपरा विष्णु-स्मरण और संयम पर केंद्रित है। इसे पौष के कृष्ण पक्ष से पहचाना जाता है।
सूर्य का मकर राशि में प्रवेश
यह सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का सौर पर्व है। तिल-गुड़, दान, स्नान और पतंग जैसे क्षेत्रीय रूप मिलते हैं।
तमिल थाई मास का पहला दिन (थाई पोंगल)
तमिल फसल-पर्व में सूर्य, कृषि और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। थाई पोंगल में नई फसल से पोंगल पकाया जाता है।
पौष शुक्ल एकादशी
पौष शुक्ल एकादशी विष्णु को समर्पित है। पुत्रदा नाम से जुड़ी कथा पारिवारिक कल्याण की प्रार्थना की परंपरा बताती है।
माघ कृष्ण चतुर्थी
गणेश-उपासना और तिल के प्रसाद से जुड़ा यह व्रत उत्तर भारत में सकट चौथ या तिलकुटा चौथ कहलाता है।
माघ कृष्ण एकादशी
षटतिला नाम तिल के उपयोग और दान की परंपरा से जुड़ा है। विष्णु-स्मरण के साथ अन्न बाँटने का भाव प्रमुख है।
माघ शुक्ल पंचमी
वसंत के आगमन और सरस्वती-पूजन का पर्व है। विद्यारंभ, पुस्तक और संगीत-साधना से इसका विशेष संबंध है।
माघ शुक्ल सप्तमी
सूर्योपासना का यह अवसर रथ सप्तमी या सूर्य जयंती के नाम से जाना जाता है। सूर्य के रथ का प्रतीक गति और प्रकाश का स्मरण कराता है।
फाल्गुन कृष्ण एकादशी
विष्णु को समर्पित इस एकादशी का माहात्म्य रामकथा की विजय-यात्रा से जोड़ा जाता है। विजय का भाव धैर्य और उचित आचरण से समझें।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी · उत्तर भारतीय पूर्णिमांत मान
शिव-स्मरण, रात्रि-जागरण और शिवलिंग-पूजन की परंपराओं का प्रमुख पर्व है। अलग क्षेत्रों में शिव-विवाह और अन्य आख्यान भी सुनाए जाते हैं।
फाल्गुन शुक्ल एकादशी
आँवले के वृक्ष और विष्णु-पूजन से जुड़ी एकादशी है। काशी की रंगभरी परंपरा का स्थानीय स्वरूप भी इसी समय आता है।
फाल्गुन पूर्णिमा
होलिका और प्रह्लाद की कथा का स्मरण करते हुए अनेक स्थानों पर सामुदायिक अग्नि-परंपरा निभाई जाती है। यह होली से पहले की संध्या से जुड़ा है।
फाल्गुन पूर्णिमा के बाद रंगोत्सव
रंग, मेल-मिलाप और वसंत का पर्व है। ब्रज तथा दूसरे क्षेत्रों में इसकी तिथियों, गीतों और उत्सव-रूपों में विविधता है।
चैत्र कृष्ण अष्टमी
शीतला माता का यह लोकपर्व कई स्थानों पर बसोड़ा कहलाता है। स्थानीय परिवारों में भोजन-प्रसाद और पूजन की अलग परंपराएँ हैं।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (घटस्थापना)
चैत्र में देवी के नौ रूपों की उपासना का क्रम शुरू होता है। घटस्थापना से रामनवमी तक अनेक परिवार पाठ और साधना करते हैं।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
महाराष्ट्र का गुड़ी पड़वा और दक्कन का उगादि चांद्र नववर्ष की संबंधित क्षेत्रीय परंपराएँ हैं। गुड़ी, पंचांग-पठन और विशेष भोजन इनके अलग रूप हैं।
चैत्र शुक्ल तृतीया
राजस्थान और आसपास की गौर-ईसर परंपरा में गौरी और शिव का स्मरण होता है। शोभायात्रा, गीत और सजे हुए प्रतिरूप इस पर्व की पहचान हैं।
चैत्र शुक्ल नवमी
राम के जन्मोत्सव का पर्व है। रामकथा-पाठ, मंदिरों के उत्सव और मध्याह्न जन्म-पूजन की परंपरा प्रचलित है।
चैत्र पूर्णिमा (उत्तर भारतीय परंपरा)
हनुमान के जन्मोत्सव की उत्तर भारतीय तिथि चैत्र पूर्णिमा है। दक्षिण भारत की कुछ परंपराएँ दूसरे मास और तिथियों पर उत्सव मनाती हैं।
वैशाख शुक्ल तृतीया
वैशाख की तृतीया दान, उपासना और नए आरंभ से जुड़ी है। परशुराम जयंती तथा कई क्षेत्रीय कृषि-परंपराएँ भी इस समय आती हैं।
वैशाख शुक्ल एकादशी
विष्णु के मोहिनी-स्वरूप का स्मरण कराने वाली एकादशी है। इसकी कथा मन की आसक्ति और विवेक के प्रश्नों से जुड़ती है।
वैशाख शुक्ल चतुर्दशी
विष्णु के नरसिंह अवतार और प्रह्लाद की भक्ति का स्मरण होता है। संध्याकालीन उपासना कई मंदिर-परंपराओं में महत्वपूर्ण है।
वैशाख पूर्णिमा
बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं का स्मरण करने वाला प्रमुख बौद्ध पर्व है। करुणा, मैत्री और ध्यान इसके प्रमुख भाव हैं; इसे केवल हिंदू उपासना तक सीमित नहीं समझें।
ज्येष्ठ कृष्णपक्ष अमावस्या
सावित्री-सत्यवान के आख्यान और वट-वृक्ष के पूजन से जुड़ी परंपरा है। उत्तर भारत में अमावस्या का रूप अधिक प्रचलित है।
ज्येष्ठ अमावस्या
शनि देव के जन्मोत्सव की प्रचलित तिथि ज्येष्ठ अमावस्या है। सेवा, संयम और न्यायपूर्ण व्यवहार का मनन इस अवसर से जोड़ा जा सकता है।
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी
गंगा-अवतरण की परंपरा का पर्व है। नदी-पूजन, स्नान और जल के प्रति सम्मान इसके प्रमुख भाव हैं।
ज्येष्ठ पूर्णिमा
सावित्री-सत्यवान और वट-वृक्ष से जुड़ा पूर्णिमा का रूप महाराष्ट्र समेत कई क्षेत्रों में मनाया जाता है। इसे अमावस्या वाले वट सावित्री से अलग तिथि पर पहचानें।
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया
पुरी में जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की गुंडिचा यात्रा का बड़ा उत्सव है। देव-विग्रह रथों पर निकलते हैं।
आषाढ़ पूर्णिमा
गुरु, शिक्षक और ज्ञान-परंपरा के प्रति कृतज्ञता का दिन है। व्यास-पूजा और अध्ययन-संकल्प इसके प्रचलित रूप हैं।
श्रावण शुक्ल तृतीया
वर्षा, हरियाली और शिव-पार्वती से जुड़ी तीज है। लोकगीत, झूले और क्षेत्रीय स्त्री-उत्सव इसकी पहचान हैं।
श्रावण शुक्ल पंचमी
नाग-पूजन का पर्व है, जिसके रूप क्षेत्र अनुसार बदलते हैं। प्रतीक-पूजन के साथ जीव-जंतुओं के प्रति करुणा का भाव रखें।
श्रावण पूर्णिमा
राखी बाँधने और स्नेहपूर्ण संरक्षण का संकल्प लेने का पर्व है। इसी पूर्णिमा पर कुछ समुदाय श्रावणी उपाकर्म भी करते हैं।
भाद्रपद कृष्ण पक्ष तृतीया
भाद्रपद की कृष्ण तृतीया पर मनाई जाने वाली तीज कई क्षेत्रों में कजली तीज कहलाती है। वर्षा और दांपत्य से जुड़े लोकगीत इसके अंग हैं।
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी
कृष्ण-जन्म का उत्सव मध्यरात्रि की उपासना, झाँकी और भागवत-कथा से जुड़ा है। स्मार्त और वैष्णव तिथि-निर्णय अलग हो सकता है।
भाद्रपद कृष्ण एकादशी
भाद्रपद कृष्ण एकादशी का नाम अजा है। इसके माहात्म्य में हरिश्चंद्र की कथा सुनाने की परंपरा मिलती है।
चिंगम मास का तिरुवोणम नक्षत्र
केरल के फसल और सांस्कृतिक उत्सव में महाबलि का स्वागत स्मरण किया जाता है। पूकलम, ओणसद्या और सामुदायिक आयोजन इसकी पहचान हैं।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी
गणेश जन्मोत्सव में स्थापना, आरती और उत्सव-पूजा की जाती है। घरों और सार्वजनिक मंडलों का उत्सव विसर्जन तक अलग अवधि का हो सकता है।
भाद्रपद शुक्ल तृतीया
पार्वती की तपस्या और शिव को पति रूप में चुनने के आख्यान से जुड़ा व्रत है। इसका नाम सखियों द्वारा वन ले जाने की कथा से समझाया जाता है।
भाद्रपद शुक्ल अष्टमी
राधा के प्राकट्य का उत्सव विशेषकर ब्रज और वैष्णव परंपराओं में मनाया जाता है। राधा-कृष्ण भक्ति और कीर्तन इसके केंद्र में हैं।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी
अनंत विष्णु के व्रत और अनंत-सूत्र की परंपरा का दिन है। कई क्षेत्रों में सार्वजनिक गणेशोत्सव का विसर्जन भी इसी दिन होता है।
भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक
पूर्वजों के स्मरण, श्राद्ध और तर्पण का पक्ष है। परिवार अपने पितरों की तिथि और परंपरा के अनुसार विधि चुनते हैं।
आश्विन कृष्ण अष्टमी
जितिया नाम से प्रसिद्ध इस व्रत में संतान के कल्याण की कामना की जाती है। जीमूतवाहन का त्याग-कथानक इससे जुड़ा है।
आश्विन कृष्ण एकादशी
पितृपक्ष में आने वाली विष्णु-समर्पित एकादशी है। इसके माहात्म्य में पितरों के कल्याण की कथा कही जाती है।
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी
आश्विन में देवी की नौ रात्रियों का पर्व है। दुर्गा-सप्तशती, गरबा, रामलीला और अनेक क्षेत्रीय परंपराएँ इस समय मिलती हैं।
आश्विन शुक्ल षष्ठी से दशमी
विशेषकर पूर्वी भारत में दुर्गा के आगमन और महिषासुर-वध का उत्सव है। पंडाल, प्रतिमा, पुष्पांजलि और विसर्जन इसके प्रमुख रूप हैं।
आश्विन शुक्ल अष्टमी
नवरात्रि के अष्टमी दिवस पर महागौरी और दुर्गा-उपासना की विविध परंपराएँ हैं। बंगाल की संधि-पूजा अष्टमी-नवमी के संधिकाल से जुड़ी है।
आश्विन शुक्ल नवमी
शारदीय नवरात्रि के नवम दिन सिद्धिदात्री, दुर्गा-पूजन और कई क्षेत्रों में आयुध-पूजा की परंपरा मिलती है।
आश्विन शुक्ल दशमी
विजयादशमी राम-विजय, देवी की विजय और विद्यारंभ जैसी अनेक क्षेत्रीय परंपराओं का दिन है। रामलीला और शस्त्र-पूजा इसके कुछ रूप हैं।
आश्विन शुक्ल एकादशी
आश्विन शुक्ल एकादशी विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप से जुड़ी है। इसका नाम प्रायश्चित्त और संयम की कथा-परंपरा में आता है।
आश्विन पूर्णिमा
शरद ऋतु की पूर्णिमा को कोजागरी लक्ष्मी-पूजा और ब्रज की रास-परंपरा से जोड़ा जाता है। रीति क्षेत्र और समुदाय के अनुसार बदलती है।
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी · पूर्णिमांत मान
चंद्रोदय और दांपत्य-मंगल की प्रार्थना से जुड़ा उत्तर भारतीय व्रत है। करवा, कथा और चंद्र-अर्घ्य इसकी प्रचलित परंपराएँ हैं।
कार्तिक कृष्ण अष्टमी
अहोई माता की कथा और संतान के कल्याण की कामना से जुड़ी उत्तर भारतीय परंपरा है। चित्र-पूजन और तारों या चंद्र को अर्घ्य के रूप मिलते हैं।
कार्तिक कृष्ण एकादशी
दीपावली से पहले आने वाली कार्तिक कृष्ण एकादशी विष्णु को समर्पित है। कथा-पाठ और संयम इसके परंपरागत अंग हैं।
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी
धन्वंतरि-जयंती, आरोग्य की प्रार्थना और धन-पूजन के विविध रूप इस दिन मिलते हैं। दीपोत्सव का क्रम कई परिवार यहाँ से शुरू करते हैं।
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी
नरकासुर-वध और अभ्यंग-स्नान की परंपराओं से जुड़ा दीपोत्सव का दिन है। इसे कई स्थानों पर छोटी दिवाली कहा जाता है।
कार्तिक अमावस्या · पूर्णिमांत मान
दीपोत्सव में लक्ष्मी-गणेश पूजन, दीप, परिवार और समुदाय का उत्सव मनाया जाता है। भारत की अलग धार्मिक व क्षेत्रीय परंपराएँ इसे अलग आख्यानों से जोड़ती हैं।
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा
कृष्ण द्वारा गोवर्धन धारण करने की कथा और अन्नकूट-भोग इस पर्व के केंद्र में हैं। अन्न, प्रकृति और समुदाय के प्रति कृतज्ञता इसका भाव है।
कार्तिक शुक्ल द्वितीया
भाई-बहन के स्नेह का यह पर्व यम-द्वितीया भी कहलाता है। तिलक और आतिथ्य के क्षेत्रीय रूप प्रचलित हैं।
कार्तिक शुक्ल षष्ठी (संध्या अर्घ्य)
सूर्य और छठी मैया की उपासना में अस्ताचलगामी तथा उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। स्वच्छता, लोकगीत और घाट पर सामूहिक साधना इसकी पहचान हैं।
कार्तिक शुक्ल षष्ठी (सूर संहारम्)
मुरुगन/स्कंद द्वारा सूरपद्मन पर विजय का स्मरण विशेषकर तमिल परंपरा में होता है। सूरसंहारम् इसका प्रमुख उत्सव-रूप है।
कार्तिक शुक्ल एकादशी
प्रबोधिनी एकादशी विष्णु के जागरण और चातुर्मास के समापन की परंपरा से जुड़ी है। कई क्षेत्रों में इसी समय तुलसी विवाह का क्रम शुरू होता है।
कार्तिक शुक्ल द्वादशी
तुलसी और शालिग्राम/विष्णु के प्रतीकात्मक विवाह का उत्सव है। परिवारों में एकादशी से पूर्णिमा के बीच भी रीति के अनुसार आयोजन होता है।
मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी
कालभैरव के प्राकट्य का स्मरण अष्टमी पर होता है। काशी और भैरव-उपासना वाले तीर्थों में यह विशेष अवसर है।
मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी
राम और सीता के विवाह का स्मरण विशेषकर अयोध्या और जनकपुर की परंपराओं में होता है। विवाह-झाँकी और रामकथा इसके रूप हैं।
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी
कुरुक्षेत्र के कृष्ण-अर्जुन संवाद का स्मरण किया जाता है। गीता-पाठ और श्लोक के प्रसंग को समझना इस अवसर का उपयोगी अभ्यास है।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा
दत्तात्रेय के प्राकट्य का उत्सव विशेषकर महाराष्ट्र, कर्नाटक और दत्त-संप्रदायों में मनाया जाता है। गुरु-तत्त्व और प्रकृति से सीखने का भाव जुड़ा है।
माघ शुक्ल एकादशी
जया एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। माघ शुक्ल एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। इसके माहात्म्य का अध्ययन करते समय कथा, मूल संदर्भ और परिवार की परंपरा को अलग पहचानें।
चैत्र शुक्ल एकादशी
कामदा एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। चैत्र शुक्ल एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। इसके माहात्म्य का अध्ययन करते समय कथा, मूल संदर्भ और परिवार की परंपरा को अलग पहचानें।
वैशाख कृष्ण एकादशी
वरुथिनी एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। वैशाख कृष्ण एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। इसके माहात्म्य का अध्ययन करते समय कथा, मूल संदर्भ और परिवार की परंपरा को अलग पहचानें।
ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी
अपरा एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। इसके माहात्म्य का अध्ययन करते समय कथा, मूल संदर्भ और परिवार की परंपरा को अलग पहचानें।
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी
निर्जला एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। इस व्रत के नाम में निर्जल साधना का उल्लेख है; स्वास्थ्य के अनुरूप वैकल्पिक साधना और कथा-पाठ भी चुना जाता है।
आषाढ़ कृष्ण एकादशी
योगिनी एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। आषाढ़ कृष्ण एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। इसके माहात्म्य का अध्ययन करते समय कथा, मूल संदर्भ और परिवार की परंपरा को अलग पहचानें।
आषाढ़ शुक्ल एकादशी
देवशयनी एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। इससे चातुर्मास और विष्णु के योगनिद्रा-काल का परंपरागत आरंभ माना जाता है।
श्रावण कृष्ण एकादशी
कामिका एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। श्रावण कृष्ण एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। इसके माहात्म्य का अध्ययन करते समय कथा, मूल संदर्भ और परिवार की परंपरा को अलग पहचानें।
श्रावण शुक्ल एकादशी
श्रावण पुत्रदा एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। श्रावण शुक्ल एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। इसके माहात्म्य का अध्ययन करते समय कथा, मूल संदर्भ और परिवार की परंपरा को अलग पहचानें।
भाद्रपद शुक्ल एकादशी
परिवर्तिनी एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। भाद्रपद शुक्ल एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। विष्णु के शयन में करवट बदलने के आख्यान से इसका नाम जुड़ा है।
मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी
उत्पन्ना एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। इसके माहात्म्य का अध्ययन करते समय कथा, मूल संदर्भ और परिवार की परंपरा को अलग पहचानें।
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी
मोक्षदा एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। इसी समय गीता जयंती की परंपरा भी आती है; कथा और गीता-अध्ययन एक साथ किया जा सकता है।
अधिक मास की शुक्ल एकादशी
पद्मिनी एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। अधिक मास की शुक्ल एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। इसके माहात्म्य का अध्ययन करते समय कथा, मूल संदर्भ और परिवार की परंपरा को अलग पहचानें।
अधिक मास की कृष्ण एकादशी
परमा एकादशी विष्णु-उपासना से जुड़ी एकादशी है। अधिक मास की कृष्ण एकादशी इसका परंपरागत पक्ष-निर्देश है। इसके माहात्म्य का अध्ययन करते समय कथा, मूल संदर्भ और परिवार की परंपरा को अलग पहचानें।
प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी
संध्याकाल में शिव-उपासना की परंपरा है। सप्ताह के वार के अनुसार सोम, भौम, शनि आदि प्रदोष नाम मिलते हैं।
श्रावण पूर्णिमा से पहले का शुक्रवार · क्षेत्रीय मान
दक्षिण भारत में लक्ष्मी के मंगल-स्वरूप की उपासना की जाती है। कलश और परिवार की समृद्धि की प्रार्थना इसके प्रमुख भाव हैं।
भाद्रपद शुक्ल पंचमी
सप्तऋषियों और ज्ञान-परंपरा का स्मरण किया जाता है। कथा के ऐतिहासिक सामाजिक विचारों को आज की समान गरिमा और स्वास्थ्य-समझ से अलग पहचानें।
मेष संक्रांति के निकट · मलयालम पंचांग
केरल की विषुक्कणि परंपरा में शुभ दृश्य से दिन की शुरुआत होती है। कृषि-चक्र और परिवार के उत्सव से इसका संबंध है।
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