अध्याय 1
सावित्री ने सत्यवान को जीवनसाथी चुना। उसकी आयु कम होने की चेतावनी सुनकर भी उसने अपने निर्णय की जिम्मेदारी स्वीकार की। दोनों वन में परिवार के साथ सादा जीवन बिताने लगे। सावित्री सचेत थी, पर उसका प्रेम भय तक सीमित नहीं था।
अध्याय 2
एक दिन वन में सत्यवान मूर्छित होकर प्राण त्याग देता है। यम जब उसके प्राण लेकर आगे बढ़ते हैं, सावित्री उनके पीछे चलती है। वह धैर्य, धर्म और संबंधों पर उनसे संवाद करती है। उसे परिवार के कल्याण के कई वर मिलते हैं।
अध्याय 3
अंततः उसके विवेकपूर्ण अनुरोध से सत्यवान को जीवन लौटता है। दोनों घर लौटते हैं और परिवार फिर मिल जाता है। महाभारत-प्रसिद्ध इस आख्यान में सावित्री केवल प्रतीक्षा करने वाली पात्र नहीं, प्रश्न करने और संवाद निभाने वाली भी है। मनन करें कि कठिन समय में संवेदना और विवेक साथ कैसे रहें।