अध्याय 1
एक साहूकार की बेटी भाइयों की प्रिय थी। व्रत के दिन उसकी थकान देखकर भाइयों ने जल्दी भोजन कराने के लिए झूठा चंद्र-दर्शन करा दिया। बहन ने उसे सच मानकर अपना संकल्प पूरा हुआ समझ लिया।
अध्याय 2
लोककथा में इसके बाद दांपत्य में संकट आता है। स्त्री अपनी भूल समझती है और अगला संकल्प सावधानी तथा श्रद्धा से निभाती है। कई क्षेत्रीय संस्करणों में उसका नाम और संकट के विवरण अलग मिलते हैं।
अध्याय 3
इस कथा का आज का मनन स्नेह और छल के अंतर को समझना है। किसी की सहायता के लिए असत्य कहना हमेशा उपयोगी नहीं होता। व्रत निजी आस्था है; स्वास्थ्य और आपसी सहमति का सम्मान रखते हुए इसका रूप चुना जाना चाहिए।