अध्याय 1
जीमूतवाहन को एक वृद्धा का दुःख सुनाई देता है। उसके परिवार का नाग-पुत्र गरुड़ के आहार के लिए जाने वाला था। राजकुमार अपने सुख तक सीमित नहीं रहता; वह दूसरे जीव की पीड़ा को अपना प्रश्न बना लेता है।
अध्याय 2
आख्यान में वह नाग के स्थान पर स्वयं खड़ा होता है। गरुड़ उसके असाधारण त्याग को देखकर अपनी क्रूरता पहचानते हैं और जीवन की रक्षा का वर देते हैं। जितिया की लोकपरंपरा में चील और सियारिन का अलग दृष्टांत भी मिलता है।
अध्याय 3
इस पुनर्कथन में आत्महानि को आदर्श बनाने के बजाय करुणा और अन्याय रोकने के भाव पर ध्यान है। बच्चों के कल्याण का संकल्प सभी परिवारों के प्रति संवेदना का कारण बने, तुलना या किसी माता को दोष देने का नहीं।