अध्याय 1
पार्वती ने अपने जीवन का संकल्प शिव से जोड़ लिया था। लोककथा में उनके पिता के सामने दूसरा विवाह प्रस्ताव आता है। अपनी इच्छा अनसुनी होने की आशंका से पार्वती व्याकुल होती हैं और अपनी सखी को मन की बात बताती हैं।
अध्याय 2
सखी उन्हें वन में सुरक्षित स्थान तक ले जाती है। वहाँ पार्वती शिव का स्मरण करती हैं और मिट्टी से शिवलिंग बनाकर पूजन करती हैं। कथा उनकी एकाग्रता और अपने निर्णय में दृढ़ रहने को महत्व देती है। शिव प्रसन्न होकर उनके संकल्प को स्वीकारते हैं।
अध्याय 3
पिता को पार्वती का मन समझ में आता है और विवाह की स्वीकृति मिलती है। हरतालिका की स्मृति में सखी की सहायता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी तपस्या। आज इस कथा से किसी अपने की इच्छा सुनने और निर्णय में उसकी गरिमा का सम्मान करने का भाव लें।