
Parvati · तप · प्रेम · धैर्य
परिचय
सती के देह-त्याग के बाद शिव समाधि में चले गए; देवताओं ने कामदेव को भेजा और वह भस्म हो गया। तब हिमालय-पुत्री पार्वती ने वह किया जो कोई नहीं कर सका — तपस्या। सप्तर्षियों ने परीक्षा ली, शिव ने खुद ब्राह्मण बनकर शिव की निंदा की, पर वे डिगी नहीं। अंत में शिव को झुकना पड़ा — प्रेम ने नहीं, प्रेम की दृढ़ता ने जीता।
आज का मौलिक मनन
जो चाहते हो, उसके लिए तपस्या मंज़ूर है? पार्वती ने जल्दी नहीं की — जगह नहीं छोड़ी।
पार्वती ने शिव को पाने के लिए मनाया नहीं, माँगा नहीं — तप किया। पत्ते खाए, फिर पत्ते भी छोड़े, और अपर्णा कहलाईं; हज़ारों साल एक ही जगह, एक ही संकल्प। हम एक हफ़्ते में नतीजा चाहते हैं और न मिले तो जगह बदल लेते हैं — नौकरी, शहर, रिश्ता, साधना। जो सचमुच चाहते हो, उसके लिए क्या तुम धीमे चलने को तैयार हो? आज कोई छलाँग नहीं; बस उसी दिशा में एक कदम, और कल फिर एक। तप का मतलब कठोरता नहीं — टिके रहना है।
छोटा अभ्यास
आज अपने एक लक्ष्य पर बिना जल्दी, बस एक कदम।
अपना एक लक्ष्य लिखो जो सचमुच मायने रखता है — छह महीने या साल भर का। आज उस पर सिर्फ़ एक कदम चलो, इतना छोटा कि टालने का बहाना न हो: 10 मिनट अभ्यास, एक पन्ना, एक फ़ोन। कैलेंडर पर आज की तारीख़ पर निशान लगाओ। कल फिर एक कदम — लगातार 21 दिन तक यही, बिना नतीजा गिने।
ये मौलिक devotional reflections हैं; भविष्यवाणी या किसी देवता का उद्धरण नहीं।