अध्याय 1
ग्रहों के सम्मान को लेकर हुए विवाद में विक्रमादित्य शनि को कम महत्व देते हैं। लोककथा राजा को ऐसे दौर में ले जाती है जहाँ उसका पद, संपत्ति और परिचित पहचान छिन जाती है। उसे साधारण श्रम और अपमान का अनुभव करना पड़ता है।
अध्याय 2
हार चोरी होने का आरोप तथा अन्य संकट उसकी परीक्षा बनते हैं। अंततः शनिदेव के दर्शन और राजा के बदले हुए भाव का प्रसंग आता है। राजा अपनी भूल स्वीकारकर दूसरों के दुःख के प्रति विनम्र होता है।
अध्याय 3
यह ज्योतिषीय लोकविश्वास का आख्यान है, हर कठिनाई का ग्रह-दोष बताने का आधार नहीं। आज का मनन है कि सुविधा में बैठे व्यक्ति को भी दूसरे की कठिनाई समझनी चाहिए। किसी की गरीबी या बीमारी को उसके कर्मों का दंड कहकर उसकी सहायता से पीछे न हटें।