अध्याय 1
हनुमान के जन्म की परंपराएँ अंजना, केसरी और पवन से जुड़ी हैं। अलग ग्रंथों में दैवी जन्म का विवरण भिन्न मिलता है। सभी में बालक का असाधारण उत्साह और आगे सेवा में लगा सामर्थ्य प्रमुख हैं।
अध्याय 2
बाल-हनुमान सूर्य को फल समझकर उसकी ओर बढ़ते हैं। वज्र-प्रहार, पवन की व्याकुलता और देवताओं के वरदान का प्रसंग आता है। यह अलौकिक बाल-लीला है, साधारण बालक की सुरक्षा से तुलना करने का मानदंड नहीं।
अध्याय 3
आगे यही शक्ति रामकार्य और सेवा में दिखाई देती है। अपना मनन इस बात पर रखें कि उत्साह को दिशा, सीख और जिम्मेदारी कैसे मिले। बच्चों की जिज्ञासा को सम्मान देते हुए उनकी सुरक्षा और मार्गदर्शन का ध्यान रखना भी इसी भाव का व्यवहारिक रूप है।