युद्ध में राम की सेना के अनेक योद्धा घायल हो गए। जाम्बवान ने हनुमान को हिमालय की औषधियों की खोज का महत्वपूर्ण कार्य बताया। संकट में सबकी आशा इस बात पर थी कि सहायता समय पर पहुँचे। हनुमान ने कार्य को अपना कर्तव्य मानकर यात्रा शुरू की।
औषधियों के पर्वत पर पहुँचने के बाद उन्हें आवश्यक वनस्पतियाँ पहचानना कठिन हुआ। लौटकर खाली हाथ सूचना देने के बजाय उन्होंने पर्वत के उस भाग को ही ले जाने का उपाय किया। रामायण की इस कथा में उनका बल सेवा के उद्देश्य से जुड़ता है। लक्ष्य अपनी क्षमता दिखाना नहीं, साथियों तक सहायता पहुँचाना था।
वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में औषधि लाने की घटनाएँ एक से अधिक अवसर पर आती हैं। अलग रामायण-परंपराओं और लोकप्रिय कथनों के विवरण समान नहीं होते। यहाँ युद्धकाण्ड 74 के प्रसंग का मौलिक संक्षिप्त पुनर्कथन दिया गया है।
आज के जीवन में इसका मनन किसी चमत्कारी उपचार के दावे के रूप में नहीं, जिम्मेदारी और समय पर मदद की भावना के रूप में किया जा सकता है। सहायता का सही तरीका न मालूम हो तो जानकार व्यक्ति से पूछना भी सेवा है।