सीता की खोज में समुद्र के सामने खड़ी वानर-सेना के लिए अगला कदम सरल नहीं था। लंका दूर थी और समय सीमित। हनुमान अपनी शक्ति का उपयोग राम के कार्य के लिए करने को तैयार हुए। उन्होंने बड़ों का स्मरण किया, मन को लक्ष्य पर लगाया और समुद्र पार करने के लिए छलाँग लगाई।
मार्ग में मैनाक पर्वत ने विश्राम का अवसर दिया। हनुमान ने उसके सद्भाव का सम्मान किया, लेकिन अपना कार्य पूरा करने की प्राथमिकता रखी। सुरसा की परीक्षा में केवल बल काम नहीं आया; उन्होंने बुद्धि और सूझबूझ से रास्ता निकाला। सिंहिका की बाधा का सामना भी करना पड़ा। लंका पहुँचने तक यात्रा ने दिखाया कि अलग परिस्थिति में अलग ढंग से काम करना पड़ता है।
यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड के आरम्भ में आता है। इसका यह संक्षिप्त पुनर्कथन मूल श्लोकों का अनुवाद नहीं है। मनन के लिए एक प्रश्न लें: किसी जरूरी काम में मुझे केवल अधिक बल लगाना है, या अपना तरीका भी बदलना है?