अध्याय 1
मंगलवार के प्रदोष से जुड़ी लोककथा में एक वृद्धा की हनुमान-भक्ति का वर्णन है। वह संकल्प को महत्व देती थी और अतिथि का आदर करती थी। एक साधु उसके घर आकर उसकी भक्ति की अत्यंत कठिन परीक्षा लेता है।
अध्याय 2
कथा उस परीक्षा को अलौकिक घटना के रूप में कहती है, जिसमें अंततः उसके पुत्र की रक्षा होती है और साधु हनुमान के स्वरूप में पहचाना जाता है। वृद्धा का विश्वास भय से आश्वस्ति में बदलता है।
अध्याय 3
ऐसे लोकप्रसंग को किसी बच्चे या व्यक्ति को जोखिम में डालने की आज्ञा की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। यहाँ हमारा मनन रक्षा, करुणा और संकट में सहारा देने पर है। भक्ति का व्यवहारिक रूप किसी की सुरक्षा को कम करना नहीं, उसकी जिम्मेदारी लेना है।