अध्याय 1
चारुमति अपने परिवार और दैनिक जिम्मेदारियों को श्रद्धा से निभाती थी। लोककथा में उसे स्वप्न में लक्ष्मी का मार्गदर्शन मिलता है। वह इसे अपने निजी वैभव तक सीमित रखने के बजाय पड़ोस की स्त्रियों से साझा करती है।
अध्याय 2
सब मिलकर पूजन की तैयारी करती हैं। कथा उनके कल्याण और मंगल की कामना करती है। आयोजन की सुंदरता केवल आभूषण में नहीं, साथ मिलकर किए काम और परस्पर आदर में भी रहती है।
अध्याय 3
वरलक्ष्मी की यह स्मृति सहयोग का एक रूप पढ़ी जा सकती है। परिवार के सुख का पूरा भार किसी एक स्त्री के व्रत पर रखना उचित नहीं। सभी मिलकर जिम्मेदारी बाँटें और उत्सव को कृतज्ञता तथा साथ बैठने का अवसर बनाएँ।