अध्याय 1
एक भक्त विष्णु से अपने घर की कठिनाई के लिए मार्ग माँगता है। आख्यान में उसे लक्ष्मी को आदर से आमंत्रित करने और निश्चित दिनों का संकल्प निभाने की प्रेरणा मिलती है। समृद्धि का स्वागत व्यवस्था और सद्भाव से जुड़ता है।
अध्याय 2
सोलह दिनों की उपासना में नियमितता प्रमुख है। एक अन्य लोककथा में कुंती और गांधारी के पूजन तथा आयोजन का प्रसंग आता है। दोनों रूपों में साधनों, संकल्प और अर्पण की तुलना के प्रश्न दिखाई देते हैं।
अध्याय 3
हमारा मनन प्रतिस्पर्धा के बजाय संतुलन पर है। घर की समृद्धि में श्रम का आदर, साफ हिसाब और जरूरतमंद के लिए स्थान भी शामिल हैं। व्रत की धार्मिक फलश्रुति को निश्चित आर्थिक लाभ का वादा बनाकर न पढ़ें।