अध्याय 1
एक संपन्न घर में अतिथि और सहायता माँगने वाले लोग बार-बार खाली लौटते थे। घर की स्वामिनी को दूसरों की ज़रूरत से अधिक अपने कामों का हिसाब प्रिय था। एक साधु ने उसके व्यवहार को प्रश्न के सामने खड़ा किया।
अध्याय 2
लोककथा में गलत समझे गए नियमों और अभाव का दौर आता है। संकट आने पर स्त्री को एहसास होता है कि समृद्धि केवल भंडार भरने का नाम नहीं। वह फिर मार्गदर्शन माँगती है और अपने व्यवहार में उदारता लाती है।
अध्याय 3
गुरुवार की प्रार्थना, भोजन बाँटना और कृतज्ञता इस परिवर्तन की पहचान बनते हैं। कथा का अपना मनन है—किसी धार्मिक रीति को यंत्र की तरह अपनाने के साथ-साथ उसका नैतिक भाव भी समझें। किसी दिन विशेष का नियम न निभा पाने पर अनिष्ट की निश्चित भविष्यवाणी करना इस परिचय का उद्देश्य नहीं है।