अध्याय 1
सुदामा अभाव में थे। परिवार के आग्रह पर वे अपने पुराने मित्र कृष्ण से मिलने चलते हैं। उनके पास भेंट में थोड़े चावल हैं। द्वारका की समृद्धि देखकर भी कृष्ण मित्र को पुराने स्नेह से अपनाते हैं।
अध्याय 2
सुदामा अपनी भेंट को छोटा समझते हैं, पर कृष्ण उसके भाव को महत्व देते हैं। विदा के समय मित्रता का सम्मान उनके मन में धन की चर्चा से बड़ा रहता है। लौटने पर समृद्धि की धार्मिक कथा आती है। आज इस प्रसंग का उपयोगी भाव किसी मित्र को उसकी आर्थिक स्थिति से कम न आँकना और उसकी गरिमा के साथ मदद करना है।