Baba Ka Sandeshप्रेम · सेवा · स्मरण

BABA KA SANDESH · LEARN & REMEMBER

संतोषी माता व्रत कथा

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अध्याय 1

एक संयुक्त परिवार की बहू को पर्याप्त भोजन और आदर नहीं मिलता था। उसका पति स्थिति जानकर रोज़गार के लिए बाहर चला गया। बहू घर का श्रम करती रही, पर अकेलेपन और उपेक्षा से उसका मन दुखता था।

अध्याय 2

एक दिन उसे संतोषी माता के व्रत की परंपरा का परिचय मिला। उसने थोड़े साधनों में गुड़-चना चढ़ाकर स्मरण शुरू किया। लोककथा में पति को घर की याद आती है और वह लौटता है। उसे अपनी पत्नी के साथ हुए व्यवहार का सच दिखाई देता है।

अध्याय 3

उद्यापन के समय ईर्ष्या और बाधा का प्रसंग आता है, फिर भूल सुधरने और माता की पहचान की कथा कही जाती है। इसका उपयोगी भाव किसी अन्य के दुःख को छिपाना नहीं, उसे सुनना है। संतोष का अर्थ अपमान सहते रहना नहीं; साझा भोजन और सम्मान के साथ घर बनाना भी है।

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