
Santoshi Mata · संतोष · सादगी · तृप्ति
परिचय
संतोषी माता गणेश की पुत्री मानी जाती हैं — रक्षाबंधन पर गणेश के पुत्रों शुभ-लाभ ने बहन माँगी, और गणेश ने ऋद्धि-सिद्धि के तेज से संतोषी को उत्पन्न किया। उनका व्रत सोलह शुक्रवार का है — गुड़ और चना, और खट्टे से परहेज़। 1975 की फ़िल्म "जय संतोषी माँ" ने उन्हें घर-घर पहुँचाया; पर उनकी सीख फ़िल्म से पुरानी है — "संतोषम् परमं सुखम्"।
आज का मौलिक मनन
जो है, वह काफ़ी है — आज इसे सच मानकर जियो। संतोष से बड़ा धन नहीं।
संतोषी माता की कथा में सबसे कठिन व्रत नहीं, सबसे सरल है — गुड़-चना, और शुक्रवार को खट्टा न खाना। खट्टा यानी शिकायत, ईर्ष्या, "उसके पास है, मेरे पास नहीं"। संतोष कोई भाव नहीं है जो एक दिन आ जाएगा — यह एक निर्णय है: "जो है, वह काफ़ी है", और इसे आज सच मानकर जीना। इसका मतलब आगे न बढ़ना नहीं है; इसका मतलब है कि आगे बढ़ते हुए भी आज की थाली का स्वाद न खोना। संतोष से बड़ा धन नहीं, और उससे सस्ता भी कोई नहीं।
छोटा अभ्यास
आज कुछ नया मत खरीदो; जो है उसका उपयोग करो।
आज कुछ भी नया मत खरीदो — न ऑनलाइन, न दुकान से, न खाने की चीज़ जो ज़रूरी नहीं। जो पहले से है, उसी का उपयोग करो — पुरानी क़मीज़, बची हुई सब्ज़ी, पढ़ी हुई किताब। दिन में तीन बार जब "कम" लगे, मन ही मन कहो — "जो है, काफ़ी है।" रात को देखो कि दिन कैसा गया — और कितना बचा।
ये मौलिक devotional reflections हैं; भविष्यवाणी या किसी देवता का उद्धरण नहीं।