अध्याय 1
लोककथा में कुम्हार के आँवे के ठीक न पकने का संकट आता है। एक अन्यायी प्रथा के कारण परिवारों के बच्चों पर भय मंडराता है। जब एक निर्धन माता के पुत्र की बारी आती है, वह सकट माता से उसकी रक्षा की प्रार्थना करती है।
अध्याय 2
आख्यान में बालक सुरक्षित मिलता है और पुरानी क्रूर प्रथा गलत सिद्ध होती है। माता की आशा और बच्चे की रक्षा इस कथा का केंद्रीय दृश्य बनते हैं। इसे किसी वास्तविक अनुष्ठान में हानि करने की विधि की तरह नहीं पढ़ना चाहिए।
अध्याय 3
सकट चौथ की कथा हमें ऐसे डर पर प्रश्न करने का अवसर देती है जिसके नाम पर निर्दोषों को कष्ट दिया जाए। भक्ति का अपना अभ्यास यह हो सकता है कि किसी बच्चे को सुरक्षित, सुना हुआ और सम्मानित महसूस कराएँ।