अध्याय 1
ऋषि पंचमी के पुराने लोकआख्यानों में उत्तंक के परिवार और सुमति के माता-पिता के प्रसंग मिलते हैं। उनमें पूर्वजन्म, पशु-योनि और पुराने शुद्धि-नियमों द्वारा संकट समझाने का प्रयास किया गया है। ये उस सामाजिक-धार्मिक परिवेश की कथाएँ हैं।
अध्याय 2
पात्र ऋषियों से मार्ग पूछते हैं, अपनी भूलों पर विचार करते हैं और सेवा व संकल्प से परिवर्तन की ओर लौटते हैं। आज इन्हें पढ़ते समय पुराने विश्वास और आज के स्वास्थ्य-ज्ञान में अंतर पहचानना आवश्यक है।
अध्याय 3
मासिक धर्म शरीर की स्वाभाविक प्रक्रिया है, नैतिक दोष नहीं। किसी स्त्री को अशुद्ध या कमतर ठहराना इस संस्करण की शिक्षा नहीं है। ऋषि-स्मरण से अध्ययन, कृतज्ञता और सबके प्रति गरिमापूर्ण व्यवहार का भाव लें।