अध्याय 1
राजा परीक्षित को अपनी एक असावधान और अपमानजनक प्रतिक्रिया के परिणाम का सामना करना पड़ता है। उन्हें जीवन की सीमित अवधि का संकेत मिलता है। वे अपने अंतिम समय को भय की भागदौड़ में खोने के बजाय सबसे जरूरी प्रश्नों के लिए समर्पित करते हैं।
अध्याय 2
गंगा के तट पर शुकदेव से उनका संवाद भागवत-श्रवण की पृष्ठभूमि बनता है। वे पूछते हैं कि मनुष्य को क्या सुनना और किसका स्मरण करना चाहिए। आज का मनन मृत्यु की भविष्यवाणी करना नहीं, समय का मूल्य पहचानना है—जो संबंध या अच्छा काम आवश्यक है, उसे अनंत कल पर न टालें।