मथुरा में देवकी और वसुदेव का जीवन कंस के भय और कारावास के बीच बीत रहा था। भागवत पुराण के कृष्ण-जन्म प्रसंग में इसी कठिन परिस्थिति में कृष्ण का प्राकट्य वर्णित है। कथा के लिए अँधेरा केवल रात का दृश्य नहीं, परिवार पर छाए संकट की पृष्ठभूमि भी है।
वसुदेव शिशु को गोकुल पहुँचाने का दायित्व लेते हैं। लोक-परंपरा में यमुना पार करने की यह छवि बहुत प्रिय है। नन्द-यशोदा के घर पहुँचने के साथ कथा नई आशा, पालन और संरक्षण की ओर बढ़ती है। जन्माष्टमी पर अलग क्षेत्रों में इस घटना को अपने गीतों और रीति से याद किया जाता है।
यह भागवत पुराण के प्रसंग पर आधारित मौलिक संक्षिप्त पुनर्कथन है। स्रोत में प्राकट्य, देवकी-वसुदेव की प्रार्थनाओं और आगे की घटना का विस्तृत संदर्भ है। आज का मनन: किसी बच्चे या निर्भर व्यक्ति की सुरक्षा और देखभाल में मैं अपना छोटा दायित्व कैसे निभा सकता हूँ?