अध्याय 1
पार्वती एक बालक को अपना द्वारपाल बनाती हैं और उसे प्रवेश की रक्षा का दायित्व देती हैं। शिव के आने पर दोनों एक-दूसरे की स्थिति नहीं पहचानते। टकराव बढ़कर एक गंभीर संकट में बदल जाता है।
अध्याय 2
अलौकिक कथा में पार्वती के दुःख के बाद बालक को हाथी का शीश मिलता है और जीवन लौटता है। उसे गणों का नेतृत्व तथा प्रथम पूज्य का स्थान दिया जाता है। ग्रंथों में जन्म के कई रूप मिलते हैं।
अध्याय 3
इस पुनर्कथन का मनन अधिकार के साथ संवाद की जरूरत है। किसी नए व्यक्ति की बात सुने बिना उसकी भूमिका नकारना संघर्ष बढ़ा सकता है। परिवार या काम में जिम्मेदारी देने के साथ जानकारी स्पष्ट करना भी जरूरी है।