अध्याय 1
धनंजय अभाव में जीवन का सहारा खोज रहा था। अन्नपूर्णा की लोककथा उसकी यात्रा को भोजन और सम्मान के प्रश्न से जोड़ती है। वह ऐसी उपासना की खोज करता है जिसमें परिवार का पोषण और मन की श्रद्धा साथ चलें।
अध्याय 2
मार्गदर्शन मिलने पर वह संकल्प अपनाता है, पर सुविधा आने के बाद नियमितता और विनम्रता में चूक जाता है। कठिनाई उसे फिर अपने संकल्प की ओर लौटाती है। शिव-अन्नपूर्णा के दर्शन का प्रसंग उसे भोजन के वास्तविक मूल्य का स्मरण कराता है।
अध्याय 3
यह कथा भोजन को केवल अपनी संपत्ति न मानने का मनन देती है। आज अन्न की बर्बादी रोकें, घर का काम बाँटें और किसी व्यक्ति को सम्मान से भोजन उपलब्ध कराने का उपयोगी अवसर देखें। दान में भी उसकी पसंद और गरिमा का ध्यान रखें।