
Annapurna · पोषण · दान · कृतज्ञता
परिचय
कहते हैं शिव ने एक बार कहा — "यह संसार माया है, अन्न भी माया है।" पार्वती अदृश्य हो गईं और संसार में अकाल पड़ गया। तब शिव स्वयं भिक्षापात्र लेकर काशी पहुँचे, जहाँ पार्वती अन्नपूर्णा रूप में रसोई चला रही थीं — और उन्होंने शिव को भिक्षा दी। बाबा नीब करौरी की भी पहली बात यही थी — "सबको खिलाओ"; कैंची में भंडारा ही पूजा है।
आज का मौलिक मनन
जो तुम्हारे पास है, वह बाँटने के लिए है। आज किसी को खिलाओ — यही सबसे पुरानी प्रार्थना है।
अन्नपूर्णा के हाथ में कलछी है और शिव उनके सामने भिक्षापात्र लिए खड़े हैं — यह चित्र कहता है कि जो खिलाता है, वह उस क्षण ईश्वर से भी बड़ा है। तुम्हारे पास जो है — भोजन, समय, जानकारी, एक कमरा — वह सिर्फ़ तुम्हारे लिए नहीं आया; वह तुमसे होकर किसी और तक जाने के लिए आया है। हम सोचते हैं पहले अपना भरें, फिर बाँटें — पर बाँटने से ही भरता है। आज किसी को खिलाओ; यह सबसे पुरानी प्रार्थना है जिसमें शब्द नहीं लगते।
छोटा अभ्यास
आज एक व्यक्ति को भोजन कराओ या भोजन का दान।
आज कम से कम एक व्यक्ति को अपने हाथ से भोजन कराओ — घर का कोई, कोई मज़दूर, कोई राहगीर — या किसी भंडारे/अन्नक्षेत्र में दान। भोजन परोसते समय मन में "ॐ अन्नपूर्णायै नमः" और पहले उसे खाने दो, फिर खुद खाओ। हो सके तो आज का अपना भोजन भी बिना शिकायत, धन्यवाद के साथ।
ये मौलिक devotional reflections हैं; भविष्यवाणी या किसी देवता का उद्धरण नहीं।