अध्याय 1
जालंधर और वृंदा के आख्यान में निष्ठा, शक्ति और देवताओं के संकट का वर्णन मिलता है। वृंदा के विश्वास को जालंधर की सुरक्षा से जोड़ा जाता है। युद्ध उस विश्वास को भी प्रश्न के केंद्र में ला देता है।
अध्याय 2
विष्णु के छद्म, वृंदा के दुःख और उसके शाप का प्रसंग आगे आता है। तुलसी और शालिग्राम की परंपराएँ इस स्मृति से जुड़ी हैं। अलग पुराणों तथा लोककथाओं में इन घटनाओं के विवरण भिन्न हैं।
अध्याय 3
यह कथा कठिन नैतिक प्रश्न भी उठाती है। छल से पहुँची पीड़ा को छोटी बात न मानें। श्रद्धा के साथ कथा पढ़ते हुए विश्वास, सहमति और किसी दूसरे को साधन बना देने की समस्या पर विचार करना संभव है।