अध्याय 1
शुम्भ और निशुम्भ सब कुछ अपने अधिकार में लेने की इच्छा रखते थे। देवी के विषय में सुनकर वे उन्हें भी अपने वैभव की वस्तु मानते हैं। देवी उनका स्वामित्व स्वीकारने से इनकार करती हैं।
अध्याय 2
देवी-माहात्म्य का युद्ध अनेक शक्तिरूपों के साथ आगे बढ़ता है। चंड-मुंड और रक्तबीज के प्रसंग इसी व्यापक संघर्ष का भाग हैं। अंत में देवी के स्वतंत्र सामर्थ्य के सामने दोनों अत्याचारी पराजित होते हैं।
अध्याय 3
इस आख्यान में नारी की स्वतंत्र सत्ता का भाव स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। किसी व्यक्ति को अपनी उपलब्धि या संपत्ति समझना अनुचित है। हमारा मनन शक्ति को नियंत्रण के लिए नहीं, अपने और दूसरे की गरिमा की रक्षा के लिए समझना है।