अध्याय 1
शीतला माता के ग्राम-आगमन की लोककथा में देवी को लोगों के असावधान व्यवहार से कष्ट पहुँचता है। एक साधनहीन कुम्हारन उनकी पीड़ा को पहचानती है और अपनी क्षमता से सेवा करती है।
अध्याय 2
उसके आतिथ्य में दिखावा नहीं होता। वह अतिथि के आराम और जरूरत का ध्यान रखती है। माता उसके स्नेह से प्रसन्न होकर अपनी पहचान देती हैं; कथा घर की कठिनाई दूर होने के वरदान के साथ आगे बढ़ती है।
अध्याय 3
इस परंपरा से सेवा का अर्थ सामने वाले की असुविधा समझना सीखा जा सकता है। शीतला-पूजा को संक्रमण, बीमारी या भोजन की सुरक्षा के वैज्ञानिक उपायों का विकल्प न मानें। श्रद्धा के साथ स्वच्छता, सुरक्षित भोजन और आवश्यक चिकित्सा का ध्यान रखें।