अध्याय 1
सगर के पुत्रों से जुड़े संकट के बाद पीढ़ियों तक समाधान की खोज चलती है। अंशुमान और दिलीप का प्रयास आगे भगीरथ के संकल्प में रूप लेता है। गंगा को पृथ्वी पर लाने का कार्य अकेली इच्छा से पूरा नहीं होता।
अध्याय 2
भगीरथ तप करते हैं, पर गंगा के वेग को सँभालने का प्रश्न भी सामने आता है। शिव अपनी जटाओं में धारा धारण करते हैं और फिर उसे प्रवाहित होने देते हैं। इस प्रकार प्रयास के साथ सहारा और संतुलन की कथा भी जुड़ती है।
अध्याय 3
गंगा का अवतरण पूर्वजों की मुक्ति की धार्मिक स्मृति बनता है। आज इसका मनन नदी के प्रति जिम्मेदारी से भी जुड़ सकता है—घाट को साफ रखना, पानी में कचरा न डालना और प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु न समझना।