अध्याय 1
एक स्त्री मिट्टी लेने गई। अनजाने में एक छोटे जीव को हानि पहुँच गई। लोककथा उस घटना से उपजे अपराधबोध और उसके परिवार पर आए दुःख को जोड़ती है। स्त्री अपनी भूल छिपाने के बजाय समाधान खोजती है।
अध्याय 2
एक दूसरे प्रचलित रूप में छोटी बहू किसी और की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेती है और स्याहू माता तक पहुँचने के लिए सेवा व परिश्रम करती है। सहायता में मिले संबंध उसे आगे बढ़ाते हैं। अंत में क्षमा और परिवार के सुख की कथा आती है।
अध्याय 3
अहोई की कथाओं में मातृत्व के साथ जीवों की रक्षा का भाव भी पढ़ा जा सकता है। दुर्घटना या संतान के दुःख के लिए किसी स्त्री को दोषी ठहराना उचित नहीं। यह पुनर्कथन करुणा, जिम्मेदारी और सहारा देने का मनन है।