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सीता · भक्ति और मनन

परंपरागत परिचय और अपने संग्रह में उपलब्ध संबंधित पाठ।

सीता

Sita · धैर्य · गरिमा · पृथ्वी

परिचय

राजा जनक हल चला रहे थे और हल की नोक से एक कन्या निकली — सीता, "हल की रेखा"। पृथ्वी की पुत्री होकर उन्होंने पृथ्वी जैसा ही धैर्य पाया — जो सब कुछ सहती है और फिर भी अन्न देती है। लंका में हनुमान ने कहा — "मैं आपको अभी ले चलता हूँ" — और सीता ने मना कर दिया: राम स्वयं आएँगे, यही मर्यादा है। शक्ति चीख़ में नहीं, ठहराव में थी।

आज का मौलिक मनन

कठिन समय तुम्हारी गरिमा छीन नहीं सकता, जब तक तुम उसे न दो। शांत रहो, जड़ें गहरी हैं।

सीता का जन्म धरती से हुआ और अंत भी धरती में — बीच में वनवास, अपहरण, अग्नि-परीक्षा और फिर त्याग। इतना सब, और कहीं उनकी गरिमा नहीं टूटी; अशोक वाटिका में रावण के सामने भी उन्होंने तिनके की ओट ली और सिर नहीं झुकाया। कठिन समय तुम्हें झुका सकता है, तोड़ नहीं सकता — जब तक तुम खुद टूटने की अनुमति न दो। तुम्हारी जड़ें तुम्हारी सोच से गहरी हैं। आज ज़मीन छुओ और उससे यही याद करो।

छोटा अभ्यास

आज मिट्टी छुओ — पौधा, बगीचा, ज़मीन।

आज कम से कम पाँच मिनट मिट्टी से जुड़ो — गमले में हाथ डालो, बगीचे में नंगे पैर चलो, या किसी पौधे को पानी दो और उसकी पत्तियाँ छुओ। उस समय मन ही मन कहो — "यह धरती मुझे थामे है।" जो बात आज तुम्हें भारी कर रही है, उसे उसी धरती को सौंप दो।

ये मौलिक devotional reflections हैं; भविष्यवाणी या किसी देवता का उद्धरण नहीं।

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