
Kartikeya · लक्ष्य · वीरता · गति
परिचय
तारकासुर को केवल शिव-पुत्र मार सकता था। कार्तिकेय छह कृत्तिकाओं ने पाला, इसलिए छह मुख — षडानन — पर भाला एक ही, "वेल"। उन्होंने बचपन में ही देव-सेना का नेतृत्व किया और तारकासुर का वध किया। दक्षिण में मुरुगन के नाम से पूजित; पलनी की पहाड़ी पर वे दंड लेकर खड़े हैं — "सब छोड़कर आया हूँ" — त्याग और लक्ष्य एक साथ।
आज का मौलिक मनन
बहुत सारे मोर्चे खोल रखे हैं। आज एक चुनो और भाला वहीं फेंको।
कार्तिकेय देवताओं के सेनापति हैं और उनका अस्त्र एक भाला है — एक। बहुत सारे तीर नहीं, एक लक्ष्य, एक वार। हम दस मोर्चे खोलकर बैठे हैं — तीन कोर्स, चार योजनाएँ, पाँच शुरुआतें — और हर एक आधा। इसीलिए थकान है और नतीजा नहीं। आज सूची मत बनाओ, सूची काटो: जो एक चीज़ सबसे ज़रूरी है, वही रहे। उसे पूरा करो, और पूरा करने की तृप्ति महसूस करो — यही गति है, यही वीरता।
छोटा अभ्यास
आज की सूची से सब हटाओ, एक चीज़ पूरी करो।
आज की पूरी सूची लिखो — फिर उसमें से सब कुछ काट दो, सिवाय एक के। वह एक चीज़ ऐसी हो जिसे पूरा करने से सबसे ज़्यादा राहत मिले। पहले वही करो — फ़ोन साइलेंट, दरवाज़ा बंद — और जब तक पूरी न हो, दूसरी न छुओ। पूरी होने पर "जय कार्तिकेय" — और आज के लिए बस।
ये मौलिक devotional reflections हैं; भविष्यवाणी या किसी देवता का उद्धरण नहीं।